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जरूरी क्या है अच्छा बनना या अच्छा दिखना?

आपके मरने के बाद कोई भी ये याद नहीं रक्खेगा कि ये कपड़े बहुत ब्रांडेड पहनता था। इसके पास फ़ोन बहुत अच्छा था। इसकी कार बहुत महंगी थी। या इसके पास बहुत बड़ा बंगला था । इन सब बातों को कोई भी याद नही रक्खेगा। सिवाय इसके की आपका व्यक्तित्व कैसा था। ये बात थोड़ी अटपटी जरूर लगती है लेकिन ये सच है। किसी को कोई मतलब नही है कि आप क्या पहनते है? किससे चलते हैं क्या खाते हैं क्या पीते हैं कितने महंगे घर में रहते हैं किसी को कोई फर्क नही पड़ता। लोग आपको केवल आपकी पर्सनैलिटी से याद रखते हैं आपके बिहेवियर से याद रखते हैं,आपकी पॉजिटिविटी से याद रखते हैं आपकी सिनसीअर्टी से याद रखते हैं अपने काम के लिए जो आपका डेडिकेशन है उसके लिए याद रखते हैं। और इसका आपके चहेते ब्रैंड से कोई लेना देना नही है। लेकिन हम सब कहीं ना कहीं दूसरों का ध्यान अपनी ओर करना चाहते हैं। इस दुनिया का हर इंसान, यही चाहता है कि सबका ध्यान मेरी तरफ हो। हर कोई कहीं न कहीं मुझसे अट्रैक्ट हो और हम इसी चक्कर में एक से एक महँगा सामान खरीदते हैं, ज्यादा से ज्यादा पैसा खर्च करते हैं अच्छा दिखने के लिए। अच्छा बनने के लिए नही। क्यों...
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समस्या नहीं तो सफलता भी नहीं।

आपने टीवी पर शेर को हिरण का शिकार करते हुए देखा होगा । आपने देखा होगा कि कैसे शेर हिरणों के झुंड पर अटैक करता है और किसी एक को मार के अपनी भूख को शांत कर लेता है। अब इसे थोड़ा सा चेंज कर देते है सोंचिये क्या हो अगर हिरणों का झुंड भागने की बजाय सारा का सारा शेर की ही तरफ हमला कर दे। शेर कितनो को मरेगा । एक को दो को तीन को चार को पांच को छह को बस इससे ज्यादा शेर का स्टैमिना नही होता कि वो एक ही टाइम में  इतने सारे हिरणों को मार सके । और उसे अपनी जान बचा के भागना पड़ सकता है । बट सारे हिरण भागते क्यों हैं । आपने कभी सोंचा । बिकॉज उनमें से हर एक हिरण शेर को देखते ही ये सोंचने लगता है यार मैं तो अकेला हूँ। अगर नही भागा तो ये मुझे मार के खा जाएगा। एंड जैसे ही वो सब ये सोंचके भागने लगते है शेर का काम और आसान हो जाता है बस दौड़ के उनकी गर्दन दबोचनी होती है ना लड़ना पड़ता है और ना ही कोई कॉम्पटीशन। बस मारा और खा गया। कहानी खत्म। अब जब आप इसे अपनी लाइफ से कोरिलेट करेंगे तो शायद ऊपर वाली बकवास समझ आये। हिरण की तरह हमे भी हर वो मुसीबत , हर वो प्रॉब्लम, हर वो बुरी घटना शेर ही लग...

एक छोटे से शब्द में छुपा है सफलता का रहस्य.

नो। इंग्लिश का ये छोटा सा वर्ड हमारे बीच बहुत फेमस है, और वो इसलिए क्योंकि इसका जो मतलब है,वो अपने आप में एक अलग ही सेंटेंस क्रिएट करता है। क्योंकि जिनको ये बोला जाता है उनके रियेक्शनस इस वर्ड को सुनने के बाद पूरी तरह से बदल जाते हैं। और कभी कभी लोगों की सोंच भी। ये जितना फेमस है उतना ही कॉमन भी और ऐसा इसलिए है क्योंकि इसका यूज़ लगभग हर कोई हर दिन किसी न किसी वजह से करता ही है । उदाहरण के लिए अगर आप आलसी है तो आपको ये बोलने में कोई भी प्रॉब्लम नहीं होगी क्योंकि आपसे जब भी कोई काम कहा जायेगा तो आपका एक ही जवाब होगा। नो। लेकिन अगर थोड़े बड़े पैमाने पे हम इस वर्ड की खासियत पे रिसर्च करेंगे तो हमारे सामने दो चीजें निकलकर सामने आएंगी, या यूं कह लें इसके दो मतलब सामने आते है। 1-नो मीन्स नहीं । 2-नो मीन्स नेक्स्ट ऑपर्चुनिटी। और इसका सबसे ज्यादा इफेक्ट पड़ता है उनपे। जिनको ये वर्ड बोला जाता है। जैसे- जब कोई पहली बार जॉब इंटरव्यू के लिए जाता है तो ज्यादातर ये देखने को मिलता है कि पहली बार में सबका सलेक्शन नही हो पाता । मतलब नो। उन्हें नो सुनने को मिलता है। अब इसका इफेक्ट लोग...

क्या सब कुछ दिखावा है?

अब सोंचने का समय नही है। क्योंकि ये कई मायनों में साबित हो चुका है कि हमारी हर परेशानी की वजह हम खुद हैं । और इसमें कोई दो राय नही है कि हमारी हर समस्या को हमने खुद पैदा किया है । ये कही बाहर से नही हो रहा। कोई और आकर आपको परेशानी में नही डाल रहा आप खुद ही परेशान हैं वो भी अपने अंदर की मानसिकता के कारण। बस हम समझ नही पा रहे है। जीवन के इतने सारे पहलुओं में ये भी एक पहलू है । जिसे समझना बहुत जरूरी है क्योंकि आप की सारी परेशानिया आप से है। या यूं कह लें आप खुद है। क्योंकि इस पूरी दुनिया में सिवाय इंसान के और कोई ऐसा जीव नही है जो सामाजिक रूप से रहता हो। कोई नही है। सिवाय हमारे । क्योंकि हम अलग है । हम सोंच सकते है,समझ सकते हैं,बोल सकते हैं। हम अपनी कल्पनाओं को वास्तविकता का रूप दे सकते है। और उसी वास्तविकता में जीते हैं लेकिन अगर इसकी ऊपरी परत को हटाकर देखा जाए तो आपको ये समझ आएगा कि आखिरमें सब कुछ कल्पना है। हमने अपनी लाइफ में जो भी चीज वास्विकता में देखी है वो पहले कल्पना थी। पहले हमने उसे अपनी कल्पना में देखा। फिर वो अस्तित्व में आई। हर चीज। एक सुई से लेकर सैटेलाइट...

आपकी सक्सेस के क्या मायने है?

सफलता और असफलता के बीच की सबसे बड़ी विभाजक रेखा को इन पांच शब्दों में बताया जा सकता है की'मेरे पास समय नही है'। (फील्ड) सक्सेसस क्या है? सिम्पल है। 90% लोग ये मानते हैं कि सक्सेसस मीन्स पैसा। बड़ा सा बंगला,ऐशो आराम की लाइफ और वो सारी चीजें जो हम पाना चाहते हैं,वो पा लेना। बट अगर वास्तव में देखा जाए तो सक्सेस क्या है? और अगर मैं आपसे सवाल करूँ की सक्सेस क्या है, तो आपका जवाब क्या होगा? हममे से हर कोई एक बेहतर लाइफ जीना चाहता है। हर कोई चाहता है कि उसकी सारी जरूरते पूरी होती रहे। जो भी उसे चाहिए वो उसे मिलता रहे और कोई प्रॉब्लम न आये। लेकिन क्या ऐसा पॉसिबल है? क्या ऐसा हो सकता है,कि किसी की लाइफ में कोई प्रॉब्लम न आये और वो ऐसे ही जीता रहे? पता है अगर ऐसा होने लगे। अगर इंसान की हर ख्वाहिश आसानी से पूरी हो जाये और उसकी लाइफ में वो सब कुछ हो, जो वो चाहता है। तो वो इंसान अपनी जिंदगी को अनुभव के उस स्तर से कभी नही जी पायेगा जो कि एक ऐसा इंसान जीता है जिसने अपनी लाइफ में बहुत सारी मुश्किलों को झेला होगा। और रही बात पैसे की तो ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास बेशुमार पै...

हमारी सोंच ।

आप की सोंच ये तय करती है कि आप इंसान कैसे हैं। और आपके काम ये तय करते हैं कि आपकी सोंच कैसी है। आप चाहे जहां भी रह रहे हो, आपको पता होगा  की कुछ लोग ऐसे होते हैं कि वो चाहे जिस भी सोसाइटी में रह रहे हों। वो चाहे अमीर हो या गरीब, वो महंगी कार से चलते हो , ब्रांडेड कपड़े पहनते हो, किसी अच्छी पोजीशन पे जॉब कर रहे हों या बिज़नेस। या फिर वो लोग जिनके पास इन सब में से कुछ भी न हो। मै आपको बताना चाहता हूं कि उन सब की सोंच बिल्कुल एक जैसी होती है क्योंकि उनके हर सेंटेंस में गाली होती है। वो चाहे जो भी बात कर रहे हों,जिससे भी बात कर रहे हों उनके हर सेंटेंस में महिलाओं को लेकर गाली होती है और ये हमारे यहाँ आम बात है करप्शन के मामले में हम  पूरे एशिया में नंबर 1 पर है। हमारे यहां स्कूल्स में, हॉस्पिटल्स में, गवर्मेंट आफिस में, कोर्ट में, पुलिस स्टेशन्स, में यहां तक कि अगर आपको अपना  आई डी कार्ड भी बनवाना है तो भी हमारे देश में रिश्वत ली जाती है। और ये हमारे यहां आम बात है मैंने देखा है हमारे यहां लोग घंटों ट्रैफिक में फसने को तैयार होते हैं बट 5 मिनट। केवल 5 मिनट ट्रै...

हमे इस पक्षी से सीखना चाहिए ।

एक बाज लगभग 70 साल जीता है, लेकिन अपनी लाइफ के 40वें साल तक आते आते उसे एक महत्वपूर्ण फैसला लेना पड़ता है। उस उम्र में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग बहुत कमजोर हो जाते है और लगभग ठीक से काम करना बंद कर देते हैं। 1.उसके पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है जिसकी वजह से वो शिकार पर पकड़ बनाने में फेल होने लगते हैं। 2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और खाना निकालने में बहुत ज्यादा परेशानी होने लगती है जिससे उसे भूखा रहना पड़ता है। 3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, और बाज की ऊंची उड़ानों को सीमित कर देते हैं। अपना खाना ढूँढ़ना, अपने खाने को पकड़ना और  खाना.... तीनों प्रक्रियाएं अपनी धार खोने लगती हैं। उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं, या तो खुद को मार ले या अपनी बाज वाली स्प्रिट को छोड़ गिद्ध की तरह दूसरों के बचे हुए खाने को खा कर अपनी लाइफ जिये या फिर खुद को रिप्रोग्राम करे, आसमान  के अनकंट्रोलबल मोनोपॉली के रूप में। जहाँ पहले दो रास्ते आसान है जिन्हें सरलता से पूरा किया जा सकता है, वहीं तीसरा बहुत ही दर्दनाक और लम्बा। ब...