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Showing posts from December, 2018

मन या भ्रम ।।

मन। नाम सुनते ही ये लगने लगता है कि यार अब मन में क्या चल रहा है? मतलब आपको पता भी नही चलता और आपका मन पूरे ब्रम्हांड के चक्कर लगा के आ जाता है । है न कितनी कमाल की चीज।। लेकिन सवाल ये है, कि क्या मन जैसी कोई चीज है भी? क्या वास्तव में हमारी बॉडी में मन नाम का कोई पार्ट है,जिसका हम इस्तेमाल कर पा रहे हैं या नहीं। कइयों का मानना है कि हमारे अंदर से जो आवाज आती है वो हमारे मन की आवाज होती है। यानी हम जो कुछ भी अपने अंदर सुन पाते हैं , अपने आप जो बात कर पाते है वो हमारे मन की आवाज है । दिमाग की बात अलग और मन की बात अलग। अब अगर ये है तो इसका क्या काम है,सबको नही पता। इनफैक्ट हमारा मन कब हमसे क्या करवा दे या कब हमको किस चीज की धुन लगवा दे कुछ कहा नही जा सकता। और सबसे बड़ी बात । 90% लोगों का इसपे कोई कन्ट्रोल नही होता। हमें नही पता कि क्या होना है ? क्या हो रहा है? और क्या होने वाला है ? और कुछ न पता होते हुए भी हम सभी इसी में उलझे रहते हैं। पर हममें से ज्यादातर लोग यही मानते है कि मन है। ये कहाँ है, हमारे शरीर के किस हिस्से में है? किसी को नही पता लेकिन है। मन है। ...

मेरा सफर पार्ट-1

पूरे 6 महीने बिना छुट्टी के लगातार काम करने बाद मुझे एक हफ्ते की लीव का अप्रूवल मिला था,वो भी दिवाली में। और आज  घर जाने इतनी जल्दी थी कि मैंने ठीक से पैकिंग करना भी जरुरी नहीं समझा। बस जल्दी-जल्दी जो भी समान सामने दिखा उसे रख लिया,बैग पैक किया और निकल पड़ा। इसी चक्कर में अपना चार्जर और ब्रश रूम पे ही भूल गया। अब जब स्टेशन पहुंच कर याद आया तो वापस जाके लाना उतना ही ज्यादा बड़ा काम लग रहा था जितना कि एक पहाड़ चढ़ना । हालांकि मेरा रूम स्टेशन से केवल 3 किलोमीटर ही दूर है। पर अब जैसे मानो हर सेकेंड मुझे मेरे घर जाने की जल्दी थी। इसलिए मैंने वहीं पास की दुकानों से अपने लिए चार्जर और ब्रश खरीदे। सामने कानपुर से बिधूना जाने वाली बस अपनी मंजिल तक जाने को तैयार खड़ी थी। वैसे तो कभी नही,पर आज न जाने क्यों वो बस भी मुझे अच्छी लग रही थी। लाल-सफ़ेद और नीले रंगों से लिपटी,ऊपर के हिस्से में शीशे की चादर ओढ़े। ऐसा लग रहा था मानो जैसे ख़ुद भगवान विष्णु का पुष्पक विमान मुझे स्वर्ग की सैर करवाने के लिए आया है।। अभी हम अपने ख्यालों के बनाये हुए विमान को देख ही रहे थे की ड्राइवर साहब के तेज़ ह...