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मेरा सफर पार्ट-1

पूरे 6 महीने बिना छुट्टी के लगातार काम करने बाद मुझे एक हफ्ते की लीव का अप्रूवल मिला था,वो भी दिवाली में।
और आज  घर जाने इतनी जल्दी थी कि मैंने ठीक से पैकिंग करना भी जरुरी नहीं समझा। बस जल्दी-जल्दी जो भी समान सामने दिखा उसे रख लिया,बैग पैक किया और निकल पड़ा।
इसी चक्कर में अपना चार्जर और ब्रश रूम पे ही भूल गया।
अब जब स्टेशन पहुंच कर याद आया तो वापस जाके लाना उतना ही ज्यादा बड़ा काम लग रहा था जितना कि एक पहाड़ चढ़ना ।
हालांकि मेरा रूम स्टेशन से केवल 3 किलोमीटर ही दूर है।
पर अब जैसे मानो हर सेकेंड मुझे मेरे घर जाने की जल्दी थी।
इसलिए मैंने वहीं पास की दुकानों से अपने लिए चार्जर और ब्रश खरीदे।
सामने कानपुर से बिधूना जाने वाली बस अपनी मंजिल तक जाने को तैयार खड़ी थी।
वैसे तो कभी नही,पर आज न जाने क्यों वो बस भी मुझे अच्छी लग रही थी।
लाल-सफ़ेद और नीले रंगों से लिपटी,ऊपर के हिस्से में शीशे की चादर ओढ़े।
ऐसा लग रहा था मानो जैसे ख़ुद भगवान विष्णु का पुष्पक विमान मुझे स्वर्ग की सैर करवाने के लिए आया है।।
अभी हम अपने ख्यालों के बनाये हुए विमान को देख ही रहे थे की ड्राइवर साहब के तेज़ हॉर्न ने हमारा दिमाग हिला दिया ।
अरे भैया चलना है कि नहीं ।
जाना हो तो बैठो नही तो हटो सामने से । काहे बस को ऐसे घूर रहे हो।।
अरे जाना है यार । ये उत्तर देके हम झट पट  बस में चढ़ गए।
अपनी फेवरेट विंडो सीट सेट की, कन्डक्टर साहब से टिकट ली और बैठ रहे।
मेरे ख्यालों में अभी से गांव के खेत , ताजी हवा, पुराने दोस्त , वहां की गलियां , मिट्टी की वो सौंधी खुशबू ।
सब कुछ अभी से महसूस हो रहा था।।
इसे खुशी कहे या उत्सुकता।
पर ये अहसास हर उस इंसान को होता है,जो अपने घर- परिवार से दूर कहीं पढ़ाई या जॉब कर रहा होता है।।
घर जाने की ख़ुशी उससे ज्यादा अच्छी तरह से और कौन समझ सकता है।
बस के स्टार्ट होने की तेज आवाज और खड़खड़ाहट ने मेरा ध्यान वापस से बस के अंदर ले लिया ।
नजर दौड़ाई तो देखा साथ मे सफर करने वाले ज्यादातर वे ही लोग थे जो अपने घर से दूर नौकरी कर रहे थे और दीवाली की छुट्टी में अपने-अपने घर जा रहे थे ।
बिल्कुल मेरी तरह।
कुछ लोग नौकरी पेशा वाले लोग थे , कुछ छोटे मोटे बिज़नेस करने वाले , कुछ परिवार भी थे और एक मजदूर वर्ग भी था ।
पर खुशी सबको एक जैसी थी।
ईश्वर ने भी हमें भावनाएं बिल्कुल एक जैसी ही दी है।
पर अफसोस हमने यहां अपनी ही नस्ल को एक कभी न दिखने वाले एक पैरामीटर से अलग अलग वर्गों में बांट रक्खा है।
जिसके चलते कुछ लोग शायद अपनी पूरी की पूरी जिंदगी में भी किसी भी छोटी सी खुशी को पूरी शिद्दत के साथ महसूस भी नही कर पाते और मर कर चले जाते है।।
अगर आप छोटी छोटी ख़ुशी के मौकों पे भी खुश नही हो पाते तो आपका इंसान होना ही बेकार है ।
अभी बस लगभग 30 किलोमीटर का सफर तय करके शिवली स्टॉप पहुंच गई थी।
ड्राइवर साहब बस को साइड में लगा के चाय नाश्ता करने के लिए निकल गए।
शिवली स्टॉप पे बस लगभग 15 मिनट तक रुकती है।
सभी लोग एक एक करके बस से उतर रहे थे कुछ न कुछ खाने के लिए।
मैं भी क्या करता बाहर निकल के टहलने लगा।
नवंबर की शुरुआत के साथ ही धूप में गर्माहट कम होने लगती है और हल्की सर्दी में मैं उसी धूप का मज़ा ले रहा था की एक अनजानी आवाज ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींच लिया।
पीछे मुड़ कर देखा तो एक 10-12 साल की बच्ची हाँथ में कटोरा लिए मासूमियत के साथ मेरे सामने खड़ी थी।।
रंग सांवला आंखें भूरी सुनहरे बाल बिखरे हुए।
उसे देखकर एकआक मुझे मेरी छोटी बहन की याद आ गई वो भी 12 साल की ही है।
मैंने इशारे से उसे पास बुलाया।
क्या नाम है तुम्हारा? गुड्डी उसने धीरे से जवाब दिया।
कहाँ रहती है? जवाब में उसने हाँथ से एक ओर इशारा किया । देखा तो वहां पे और भी बच्चे खेल रहे थे कुछ महिलाएं भी थी उसी पेशे की जिसे की इस बच्ची ने धारण किया हुआ था।।
स्कूल क्यों नही जाती ये पूछने से पहले मुझे खयाल आया की हम उस देश में रहते है जहां स्कूल से ज्यादा धर्मस्थल हैं।
अब क्या हमें हैरान होने की जरूरत नही है।
मैंने उसे कुछ खाने की चीजें लेकर दी वो खाना देखते ही खुश हो गई और लेके अपनी माँ के पास भाग गई।
बच्चे  एकदम साफ मन के होते हैं उनके अंदर भेदभाव नही होता हमारे जैसा।
वो अपनी माँ के पास बैठ कर अपने भाई बहनों के साथ मेरा दिया हुआ खाना खा रही थी।
तभी बस हार्न देने लगी तो वापस अपनी सीट पर आखर बैठ गया।
मानवाधिकार संगठन के अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ 80 बच्चे सड़कों पर रहते या काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा तथा नशीले पदार्थों के शिकार हैं।
पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि हर साल हज़ारों बच्चों को घर से अगवा कर लिया जाता है और उन्हें भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है.
आज दिल्ली की सड़कों पर करीब 60,000 भिखारी हैं. उनमें से एक तिहाई की उम्र 18 साल से कम है।
भारत मे लगभग रोज 1 लाख बच्चों को भूखा सोना पड़ता है और ये सब गरीबी रेखा से नींचे के स्तर का जीवन जीते है।
ये तो केवल आंकड़े है जो गलत भी हो सकते है पर सच्चाई शायद इससे भी ज्यादा बद्दतर होगी।।
हम चाहे भी तो इससे दूर नही भाग सकते लेकिन समय के साथ हम इंसानियत से इतना दूर हो गए हैं।
कि वास्तविकता हम देखकर भी देख नही पा रहे हैं।।

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